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दीपक जलाने वाले लोग सर्वत्र आलोक फैलाते हैं

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दीपक जलाने वाले लोग सर्वत्र आलोक फैलाते हैं
12 July 2026

दीपक जलाने वाले लोग सर्वत्र आलोक फैलाते हैं

दीपक जलाने वाले लोग सर्वत्र आलोक फैलाते हैं तमसः परस्तात आलोक हिरण मगरी के शुभारंभ दिवस पर मन की बात श्री गुरु डॉ. प्रदीप कुमावत कुछ तिथियाँ / दिनांक कैलेंडर में नहीं रहतीं, वे मन के भीतर बस जाती हैं। 12 जुलाई मेरे लिए ऐसी ही एक तारीख है। यह केवल आलोक हिरणमंगरी के विद्यालय के शुभारंभ का दिन नहीं, बल्कि उस विश्वास का जन्मदिन है जिसने अभावों की चट्टानों पर भविष्य का मंदिर खड़ा कर दिया। आज मैं कोई इतिहास नहीं लिख रहा हूँ। न किसी उपलब्धि का बखान कर रहा हूँ। मैं केवल अपने मन की बात कह रहा हूँ। इसलिए कि समय ने मुझे आलोक संस्थान की सबसे लंबी यात्रा का साक्षी बनाया है। मैंने इसके उजले प्रभात भी देखे हैं और घनघोर अँधेरी रातें भी। मैंने सम्मान के पुष्प भी देखे हैं और आलोचनाओं के काँटे भी। मैंने तालियाँ भी सुनी हैं और उपहास भी। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—यदि उद्देश्य पवित्र हो, नीयत निर्मल हो और कर्म निरंतर हो, तो समय स्वयं सबसे बड़ा न्यायाधीश बन जाता है। आज जब यह लिख रहा हूँ तो मेरे सामने दो तस्वीरें रखी हैं। एक मेरे पूज्य पिताश्री, संस्थापक आचार्य श्यामलाल कुमावत की और दूसरी मेरी पूज्य माताजी रुक्मिणी देवी की। दोनों मौन हैं, पर उनका मौन भी मुझसे बहुत कुछ कहता है। ऐसा लगता है जैसे पिताजी आज भी वही प्रश्न पूछ रहे हों—"क्या संस्था का मूल उद्देश्य सुरक्षित है?" और माताजी की करुणामयी दृष्टि मानो आशीर्वाद दे रही हो—"चलते रहो, थको मत।" मेरी नानी कहा करती थी परथीराज।कदी घबरानौ नि ( मेरे ननिहाल पक्ष मुझे पर्थीराज कहता था) मेरी आँखें बार-बार भीग जाती हैं। क्योंकि मैं जानता हूँ कि किसी भी महान संस्था की नींव केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट से नहीं बनती; वह बनती है त्याग, तप, विश्वास और अनगिनत मौन बलिदानों से। पिताजी ने कोई पुस्तक नहीं लिखी, लेकिन उन्होंने अपना जीवन एक ऐसी खुली पुस्तक की तरह जिया जिसे पढ़कर पीढ़ियाँ सीख सकती हैं। वे कहा करते थे—"संस्थाएँ भवनों से नहीं, विचारों से जीवित रहती हैं। भवन टूट जाएँ तो फिर बन सकते हैं, लेकिन यदि विचार टूट जाएँ तो संस्था केवल नाम बनकर रह जाती है।" आज मुझे भगवान जगन्नाथ की नवकलेवर परंपरा स्मरण आती है। बारह वर्ष बाद उनका विग्रह बदल जाता है, पर भीतर का दिव्य ब्रह्म तत्व वही रहता है। शायद यही किसी संस्था का भी सत्य है। समय बदलता है, लोग बदलते हैं, भवन बदलते हैं, तकनीक बदलती है, लेकिन यदि संस्था का मूल दर्शन सुरक्षित रहे तो उसकी आत्मा अमर रहती है। आलोक की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी इमारतें नहीं हैं। उसकी सबसे बड़ी संपत्ति वे संस्कार हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे हैं। आज की पीढ़ी जब वातानुकूलित कक्षाओं में बैठती है, तो शायद उसे यह ज्ञात नहीं कि कभी इसी परिसर की प्रत्येक ईंट संघर्ष की कहानी कहती थी। जिस पहाड़ी पर आज बच्चों की हँसी गूँजती है, कभी वहाँ सन्नाटा था। लोगों ने कहा—"यहाँ विद्यालय नहीं बन सकता।" किसी ने कहा—"यहाँ तो भूत रहता है।" किसी ने सहयोग रोकने का प्रयास किया। किसी ने निराश करने का। लेकिन संसार का इतिहास गवाह है—जो लोग दीपक जलाने निकलते हैं, वे आँधियों से डरकर लौटते नहीं। आचार्य श्यामलाल कुमावत भी नहीं लौटे। उन्होंने संघर्ष को भाग्य नहीं, साधना माना। उनके पास धन कम था, लेकिन विश्वास अथाह था। साधन सीमित थे, पर संकल्प असीम था। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि मेरे पास क्या नहीं है; उन्होंने हमेशा यह सोचा कि जो है, उसी से राष्ट्र के लिए क्या किया जा सकता है। यही सोच आलोक की आत्मा बनी। आज यदि इस लेख को कोई शिक्षक पढ़ रहा है तो वह याद रखे—एक शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाता, वह आने वाले भारत का चरित्र गढ़ता है। यदि कोई अभिभावक पढ़ रहा है तो वह यह समझे कि बच्चों को केवल सफल नहीं, संस्कारित बनाना भी हमारी जिम्मेदारी है। और यदि कोई विद्यार्थी इसे पढ़ रहा है तो वह यह विश्वास अपने भीतर जगा ले कि परिस्थितियाँ कभी किसी मनुष्य का भविष्य तय नहीं करतीं; उसका पुरुषार्थ करता है। संघर्ष से मत घबराइए। विरोध से मत टूटिए। समय कभी भी उन लोगों को पराजित नहीं कर पाया जिनके भीतर सेवा का दीप जलता रहा। आलोक की यात्रा हमें यही सिखाती है कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य बनने की साधना है। विद्यालय केवल परीक्षा में अंक दिलाने का स्थान नहीं, बल्कि जीवन में प्रकाश जगाने का तीर्थ है। यदि इस स्थापना दिवस पर हम सब केवल एक संकल्प ले लें कि अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी, संवेदनशीलता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे, तो यही इस दिवस की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। क्योंकि अंततः इतिहास इमारतों को नहीं याद रखता, इतिहास उन लोगों को याद रखता है जिन्होंने दूसरों के जीवन में प्रकाश पहुँचाया। आइए, हम सब भी ऐसा ही एक दीपक बनें। सम्प्रति निदेशक आलोक संस्थान